March 16, 2009

तह नहीं, सतह पर

पिछले कुछ दिनों से टीवी चैनलों में पाकिस्तान की खबर छाई हुई थी...नवाज़ शरीफ का लॉन्ग मार्च कहां तक पहुंचा, इसकी पल पल की जानकारी पाकिस्तानी टीवी चैनलों के ज़रिए दिखाई जा रही थी...सोमवार को चैनलों ने खबर चलानी शुरू की कि नवाज़ के लॉन्ग मार्च से पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी डर गए हैं...नवाज़ जीत गए हैं और पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस पद पर इफ्तिक़ार मोहम्मद चौधरी को फिर बिठाया जाएगा...जस्टिस चौधरी वही हैं, जिन्हें पाकिस्तान में आपातकाल लागू करते वक्त तब के राष्ट्रपति और सेना प्रमुख रहे जनरल परवेज मुशर्रफ ने बर्खास्त कर दिया था...
चैनल इस खबर को ताने हुए थे, लेकिन खबर की तह तक वो नहीं पहुंचे...ज़रदारी की हार और नवाज़ की जीत के हेडर स्क्रीन के ऊपर दनादन चल रहे थे, लेकिन खबर को इन चैनलों के लोग पकड़ नहीं सके...खबर ये थी कि जस्टिस चौधरी और अन्य बर्खास्त जजों को 22 मार्च से बहाल किया जाएगा...इससे पहले 21 मार्च को मौजूदा चीफ जस्टिस अब्दुल हमीद डोगर रिटायर होंगे...खबर ये थी कि ज़रदारी ने नवाज़ से शिकस्त नहीं खाई...उन्होंने अब तक परवेज मुशर्रफ के खास माने जाने वाले जस्टिस डोगर को कार्यकाल पूरा करने दिया...दरअसल बेनज़ीर भुट्टो जब पाकिस्तान लौटी थीं तो खबर ये थी कि मुशर्रफ और उनके बीच डील हुई है...इस डील की खबर में ये भी था कि मुशर्रफ और उनके अधीन सेना पीपीपी को जीतने का पूरा मौका देगी, लेकिन पीपीपी कभी भी मुशर्रफ के लिए गए फैसलों पर सवाल नहीं उठाएगी...पहले बेनज़ीर लौटीं, फिर आसिफ अली ज़रदारी आए और बेनज़ीर की हत्या के बाद पीपीपी की कमान पिछले दरवाजे से थाम ली...
शायद न्यूज़ चैनलों को ये पुरानी खबर याद नहीं थी, सो ज़रदारी के झुकने और नवाज़ के जीतने की खबर तन कर चल रही थी...यानी तह तक कोई नहीं था, सतह पर इस खबर से बैटिंग की जा रही थी...कौन किसे पछाड़ सकता है, उस पर सब जुटे हुए थे...पाकिस्तानी पत्रकारों का फोनो चल रहा था और बलिहारी इन पाकिस्तानी पत्रकारों की भी कि उनकी भी नज़र सतह पर ही थी...ज़रदारी ने किस तरह मान ली नवाज़ की मांग, ये किसी की समझ में नहीं आ रहा था...सतह पर बैटिंग और एक दूसरे को पटकनी देने का सिलसिला दोपहर बाद तक जारी रहा, लेकिन असल खबर खो चुकी थी और इसे खोजने की ज़हमत किसी ने नहीं उठाई...

March 13, 2009

न्यूज़ सेंस को ऐसे करें डेवलप

अपने पोस्ट खबर की खिचड़ी ऐसे पकाएं में मैंने डेस्क के साथियों को बताया था कि टीवी की किसी खबर को विजुअली कैसे अच्छा बना सकते हैं....इस किस्त में बात करेंगे न्यूज़ सेंस की...क्योंकि बिना न्यूज़ सेंस के खबर को किस एंगल से चलाना है, ये तय नहीं किया जा सकता...
न्यूज़ सेंस या खबर को पकड़ने का एंगल कोई किसी को सिखा नहीं सकता...इसे डेवलप करना पड़ता है...न्यूज़ सेंस डेवलप करने के लिए कम से कम दो अखबार पढ़ने चाहिए और एक ही खबर को दोनों ने किस तरह लिखा है, इस पर ध्यान देना चाहिए...मेरे हिसाब से डेस्क पर काम करने के इच्छुक नए लोगों को इंडियन एक्सप्रेस और अमर उजाला पढ़ना चाहिए...इंडियन एक्सप्रेस की कई खबरें मूल खबर के अंदर से निकालकर बनाई जाती हैं...इसी तरह अमर उजाला में बड़ी स्टोरीज की कई साइड स्टोरीज देने का चलन है...इनके अलावा कोलकाता से प्रकाशित होने वाला अंग्रेजी अखबार द टेलीग्राफ भी इस काम में मदद कर सकता है...डेस्क के साथियों को ये सलाह भी दे रहा हूं कि वे अखबार पढ़ें तो हर पन्ने को और यहां तक कि कॉलम्स को भी पढ़ें...इससे ज्ञान भी बढ़ता है और न्यूज़ सेंस भी डेवलप होता है...इनके अलावा इंटरनेट तो है ही...खुद को नेट सैवी बनाना भी आज मीडिया की दुनिया में चमकने के लिए जरूरी है...तो ये थी खबर की खिचड़ी पकाने की दूसरी किस्त...सिलसिला चलता रहेगा...

March 10, 2009

कहानी घर-घर के बाँकों की

इस शीर्षक के लिए एकता कपूर से क्षमायाचना...कॉपीराइट का मामला है भाई, लेकिन क्या करें, मीडिया में मेरे जैसे लोग उठाईगीर ही होते हैं...सो इस कहानी के लिए यह शीर्षक सधन्यवाद उनके सौजन्य से लेते हैं और शुरू करते हैं कहानी घर-घर के बाँकों की... विक्रम ने वेताल को पीठ पर फिर लादा और श्मशान की ओर चल दिया...रास्ता लंबा था...पीठ पर टंगे वेताल ने फिर एक कहानी विक्रम को सुनानी शुरू कर दी...वेताल बोला...सुनो विक्रम, दो बाँकों की इस नई कहानी को...इससे तुम्हें थकान नहीं होगी और मुझे आसानी से श्मशान तक पहुंचा सकोगे...वेताल की कहानी इस प्रकार थी - दो बाँके थे...एक ही घर में...दोनों लड़ते रहते थे...सुबह से रात तक बाँकों की जंग होती रहती थी...इन बाँकों के साथ कुछ छोटे बाँके भी थे...ये छोटे बाँके भी इस जंग में अपने-अपने हिसाब से मौजूदगी दर्ज कराते रहते थे...झगड़ा छोटी-छोटी बातों पर होता था...लेकिन इन छोटी बातों पर होने वाली जंग कई बार लंबी खिंचती थी...दोनों बाँके इस जंग को जीतने पर आमादा रहते...कैसे एक-दूसरे को पटकनी दी जाए, इस पर हमेशा चिंतन मनन चलता रहता था...रात में नींद में भी दिमाग में चालें आती रहती थीं...घर के बड़े बुजुर्ग परेशान...कैसे थमे यह घमासान...बड़े जतन किए...जंग जब शुरू हुई तो समझाया...कभी डांटा, लेकिन एक बाँका अपनी जांघों पर थाप दे तो भला दूसरा कैसे चुप रहे...सारे बाँके अपना नंबर बनाने और दूसरे का पीछे से बिगाड़ने का काम करते...झगड़ा था उस ज़मीन के लिए, जिसकी पैदावार से बाँकों के परिवार पेट भरते थे...परिवार बड़ा था...इसलिए ज़मीन से कम से कम इतनी पैदावार होनी ज़रूरी थी कि खर्चा चलता रहे और कर्ज़ न बढ़े...लेकिन बाँकों को कौन समझाए...हर बार कम पैदावार का ज़िम्मेदार एक-दूसरे को वो ठहराते...एक बीज बोता, तो दूसरा उन्हें निकाल फेंकने का पूरा जतन करता...एक की फसल थोड़ी उगती तो दूसरा सोचता कि कैसे इसे काट लिया जाए...काटने और फेंकने की यह जंग जारी रही...जंग चल रही है...पता नहीं कभी खत्म होगी भी या नहीं...सब यही कहते हैं कि खेत (यानी बचा खुचा) सकुशल है... कहानी सुनाने के बाद वेताल ने फिर विक्रम के सामने एक सवाल दाग दिया...पूछा कौन हैं ये बाँके और किस घर की कहानी है ये...जानते हुए भी नहीं बताओगे तो तुम्हारे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे...विक्रम रुका...धोती के फेंटे से एक पुड़िया निकाली...कहा, तुम्हारी कहानी से वैसे ही सिर फटा जा रहा है...ज़रा डिस्प्रिन खा लूं...वैसे मेरा भी एक सवाल है...सवाल ये कि बाँकों वाले उस घर में डिस्प्रिन की खपत कितनी थी ? आप भी बूझिए...कौन से घर की कहानी है ये और दोनों बाँके कौन हैं...

March 9, 2009

ख़बर की खिचड़ी ऐसे पकाएं

पिछले दिनों मैंने एक ब्लॉग पोस्ट किया था, जिसका शीर्षक गर्त में पत्रकारिता था...मैंने उसमें रिपोर्टर्स के स्टोरी देने के तौर तरीकों पर सवाल उठाए थे....मेरे कई साथी इससे आहत हुए...एक से मैंने बाकायदा माफी भी मांगी...आज ये पोस्ट इसलिए लिख रहा हूं कि पत्रकारिता को गर्त में धकेलने वाले अकेले रिपोर्टर नहीं हैं...इंस्टीट्यूट्स से ताज़ा ताज़ा निकले और डेस्क पर आने वाले भी आधी अधूरी जानकारी के साथ आते हैं...पहली वजह यही है कि वे पढ़ते लिखते नहीं...टीवी पत्रकारिता का कोर्स वे करते हैं, लेकिन टीवी क्या है, इसकी खबरें कैसे चलती हैं, ये ज़्यादातर जगह उन्हें बताया नहीं जाता...स्क्रिप्ट कैसी होनी चाहिए, कैसे इसे catchy बनाया जाए, ये उन्हें पता नहीं होता...आज ये ब्लॉग मैं ऐसे ही साथियों के लिए लिख रहा हूं...उम्मीद है मेरा लिखा उनके काम आएगा...
1. पहली बात तो ये कि जो भी खबर बनाएं, उसके लिए पहले visuals देखें....visuals के मुताबिक ही टीवी की स्क्रिप्ट लिखी जाती है....आपने पहले अति उत्साह में स्क्रिप्ट लिख ली और उसके मुताबिक visual नहीं मिले तो आपका अच्छा लिखा हुआ भी बेकार हो जाएगा...टीवी चूंकि दृश्य माध्यम है, इस वजह से visuals के साथ जितना खेलेंगे, उतना ही दर्शकों को अपनी खबर से आप जोड़ सकेंगे...लेकिन ध्यान रखना चाहिए कि आपकी स्क्रिप्ट में नाटकीयता न हो...ज़्यादा नाटकीयता दर्शक पकड़ लेता है और आपकी खबर उसे हल्की लगने लगती है...
2. टीवी पर खबर को एंकर विजुअल, जिसे कहीं कहीं एसटीडी वीओ कहा जाता है, एंकर बाइट और पैकेज के तौर पर चलाया जाता है...डेस्क में खबर आते ही पहले उसे एंकर विजुअल या एंकर बाइट के तौर पर एयर किया जाता है और बाद में ज़रूरी हुआ तो इसे पैकेज में कन्वर्ट किया जाता है...पैकेज में वॉयस ओवर और बाइट होते हैं...मैंने कई साथियों को देखा कि वो बिना एंकर लिंक लिखे ही वीओ और बाइट के ज़रिए पैकेज लिख देते हैं...लेकिन मुझे लगता है कि किसी भी पैकेज में एंकर से पहला वीओ, उस वीओ से पहली बाइट फिर बाइट से दूसरा वीओ, फिर दूसरी बाइट और फिर फाइनल वीओ जुड़े होते हैं...अगर आपका एंकर catchy है तो आप की ख़बर देखने के लिए दर्शक मजबूर होगा, वरना पैकेज चाहे कितना ही अच्छा हो, दर्शक अपने रिमोट के ज़रिए दूसरे चैनल पर भी जा सकता है...
3. अब बात editing की...एडिटिंग में जम्प का ध्यान रखने पर और visuals का तारतम्य होने पर ही कोई स्टोरी अच्छी बनती है...अमूमन जम्प में टाइम जम्प, लोकेशन जम्प, कलर जम्प का खास ध्यान रखना पड़ता है...अगर आपने पहले दिन का फुटेज लगाया, फिर रात या शाम का और फिर दिन का फुटेज लगाया तो ये टाइम जम्प होता है...लोकेशन जम्प में अगर आप किसी शख्स को पहले कहीं और, फिर कहीं और, उसके बाद पहली वाली लोकेशन पर दिखाते हैं तो आपकी स्टोरी ख़राब हो जाती है...कलर जम्प भी ऐसा ही होता है...अगर आप नीला रंग दिखा रहे हैं, फिर आप बैंगनी और फिर नीले पर आ जाएं तो ये कलर जम्प होता है...एक और जम्प एक्सिस जम्प कहलाता है...एक्सिस जम्प में किसी व्यक्ति या जगह को पहले बाएं से दिखाएं, फिर दूसरे शॉट में उसके दाएं आ जाएं तो ये एक्सिस जम्प कहलाएगा...होना ये चाहिए कि कैमरा घूमे...यानी पहले बाएं, फिर सामने और फिर दाएं आए...
4. कई जगह अंग्रेज़ी में बाइट होती है तो उसका पैरा डब करने का चलन है, लेकिन मुझे लगता है कि इससे जो बाइट है उसकी आत्मा मर जाती है...ठीक वैसे ही, जैसे किसी दूसरी भाषा की फिल्म को डब करने पर होता है...पैरा डब की जगह अगर उस व्यक्ति की बोली जा रही बातों का ट्रांसलेशन दिया जाए तो ये अच्छा लगता है...
पहली किस्त में इतना ही...

March 8, 2009

मान लिया मुशर्रफ ने कि दाउद पाक में

"Even if he (Dawood Ibrahim) is handed over, relations (between India and Pakistan) will not improve. I challenge." Former Pakistan President Pervez Musharraf stated this when asked whether Pakistan could hand over Dawood as a confidence building measure. When suggested that it may be given a try, the retired general said "if we fail, you will hand him over back to us." Musharraf, while interacting at a conclave, earlier claimed that he did not "know at all if he (Dawood) is in Pakistan".

देख रहे हैं आप...कैसे पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति या यूं कहें जबरन राष्ट्रपति बने रहकर अपना उल्लू सीधा करने वाले मुशर्रफ कैसे मान गए कि मोस्ट वांटेड इंटरनेशनल टेररिस्ट दाऊद इब्राहिम पाकिस्तान में है...मुशर्रफ दरअसल भारतीय मीडिया के सवालों के जाल में घिर गए थे...अब घिरने वाला आदमी जब भी बोलता है तो सोच नहीं पाता कि क्या बोल रहा है...ऊपर मुशर्रफ का जो बयान दिया गया है, वो उन्होंने दिल्ली में दिया है...उनके इस बयान से साफ है कि पाकिस्तान और उसकी खुफिया एजेंसी आई.एस.आई. दाऊद को पाल पोस रही है...गौर कीजिए, क्या कहा मुशर्रफ ने...When suggested that it may be given a try, the retired general said "if we fail, you will hand him over back to us."

देखिए, ऊपर अंग्रेज़ी में जो लिखा है...गौर कीजिए इस पर....लेकिन सवाल ये है कि दिल्ली में अमेरिकी दूतावास के लोगों ने क्या इस पर गौर किया है...वो अमेरिका, जिसे दाऊद की तलाश है....भारत को भी ये मोस्ट वांटेड आतंकी चाहिए...दाऊद के बारे में भारतीय खुफिया एजेंसियों ने कई बार पाकिस्तान को सबूत दिए हैं...बताया गया है कि वो अपने भाइयों और गुर्गों के साथ कराची के क्लिफटन इलाके के एक शानदार बंगले में रहता है...लेकिन पाकिस्तान की किसी भी सरकार ने इसे नहीं माना....दाऊद पर 1993 में मुंबई में धमाकों के ज़रिए दो सौ से ज़्यादा लोगों की जान लेने का आरोप है...लेकिन अपने यहां उसका वजूद होने से ही पाकिस्तान इनकार करता रहा है...कहता है, क्लिफटन के जिस बंगले का नंबर दिया गया, वहां कोई और रहता है...लेकिन अब मुशर्रफ ने गलती से ही सही, मान लिया है कि दाऊद इब्राहिम उनके देश की मेहमाननवाज़ी का लुत्फ उठा रहा है...मुशर्रफ साहब, आप पाकिस्तानी सेना के सबसे बड़े ओहदे पर रहे हैं और अब जब गलती से ही सही हकीकत आप उगल चुके हैं तो अपने डिप्टी रहे जनरल अशफाक परवेज कियानी साहब से कहिए कि वो दाऊद को सीमा के इस पार भिजवा दें...अदालत का सामना उसे करने दें....आप दावा कर रहे हैं कि दाऊद को सौंपने के बाद भी भारत और पाकिस्ता के बीच रिश्ते नहीं सुधरेंगे...लेकिन आपका ये दावा उसी तरह कहीं नहीं ठहरता, जैसा दाऊद को लेकर अब तक के आपके दावे नहीं टिके हैं...

March 5, 2009

ये कैसा सेंसर

मैं जिन ब्लॉग्स को फॉलो करता हूं, उनमें से एक है सदी के महानायक का...सदी के महानायक यानी अमिताभ बच्चन...अमिताभ इसमें हर रोज़ कुछ न कुछ लिखते हैं और ब्लॉग पोस्ट किए जाने के समय को देखकर कभी कभी अचरज होता है कि आखिर इस उम्र में इतनी एनर्जी उन्हें कहां से और कैसे मिलती है...एक पोस्ट में देखा था...रात तीन बजे के आसपास का समय था...उनके ब्लॉग से ही मेरे इस पोस्ट का शीर्षक निकला है...दरअसल अमिताभ जो भी पोस्ट लिखते हैं, उस पर तमाम कमेंट आते हैं...उनके एक फैन ने कनाडा के वैंकूवर से अपना एक कमेंट दिया...बिग बी की खूब तारीफ करते इस पोस्ट में उसने लिखा कि फिल्म शोले उसे इतनी पसंद है कि जितनी बार भी देखे, मन नहीं भरता...कमेंट लंबा था और इंटरेस्टिंग भी...मैं पढ़ता गया...वैंकूवर वाले अमिताभ के इस फैन ने लिखा है कि शोले देखने का मन हुआ तो वो वॉलमार्ट के स्टोर गया...खोजा तो इस फिल्म की डीवीडी उसे मिल गई और अब जब मन चाहे, वो इस फिल्म को देख सकता है...
लेकिन इसके नीचे उसने जो लिखा है, वो भारत में फिल्मों को सेंसर करने के लिए बैठे लोगों के कान खड़े करने के लिए काफी है...उसने लिखा है कि इस डीवीडी में उसने देखा कि शोले में ठाकुर कैसे अंत में गब्बर सिंह को मार देता है और वीरू से लिपटकर फूट फूटकर रोता है....इस डीवीडी में ये भी है कि ठाकुर के जूतों में सत्येन कप्पू यानी ठाकुर का नौकर कीलें लगा रहा है...मैंने बचपन में शोले देखी थी और आज भी जब मौका मिलता है, देखता हूं...लेकिन ये सीन्स तो कभी नहीं देखे...मुझे याद नहीं पड़ता कि किसी और ने भी शोले में ऐसे किसी सीन की बात मुझसे की हो...सुना ज़रूर है कि फिल्म में ठाकुर के जूते तले लगे कीलों से गब्बर की मौत का सीन था, लेकिन सेंसर ने इसे पास नहीं किया...तो फिर वॉलमार्ट में मिल रही डीवीडी में ये सीन कैसे है...क्या अनसेंसर्ड शोले चुपचाप विदेश पहुंच गई ? लगता तो ऐसा ही है...हालांकि अमिताभ के उस फैन ने अपने कमेंट में ये नहीं लिखा है कि फिल्म की शुरुआत में सेंसर बोर्ड का सर्टिफिकेट दिख रहा है या नहीं...लेकिन इससे ये आशंका ज़रूर बढ़ती है कि जिन सीन्स पर सेंसर की कैंची चलती है, वो चोरी-चोरी, चुपके-चुपके विदेशों में पहुंच रही है...इस आशंका की वजह ये भी है कि जिन सीन्स को सेंसर हटाता है, उनका नेगेटिव नष्ट कराने का कोई नियम नहीं है...यानी प्रोड्यूसर के पास ये फुटेज रहते हैं...साफ है सेंसर सिर्फ भारत की सीमा तक ही है, सीमा पार कुछ भी दिखाया जा सकता है और शायद दिखाया जा भी रहा है...

February 26, 2009

गर्त में पत्रकारिता

पत्रकारिता के लिए भीड़ लगी है...इंस्टीट्यूट्स खुले हुए हैं...लाखों की फीस देकर लोग पत्रकार बन रहे हैं...हर साल हज़ारों पत्रकार ये इंस्टीट्यूट्स पैदा कर रहे हैं...लेकिन ये पत्रकार किसी काम के नहीं...इनका पढ़ने-लिखने से कोई मतलब नहीं...पढ़ने लिखने से मतलब नहीं है सो जानकारी भी नहीं...हर साल जो हज़ारों लोग डिप्लोमा लेकर इस मैदान में उतरते हैं, उनमें से ज़्यादातर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की ओर रुख करते हैं...बस एक ही तमन्ना...या तो रिपोर्टर बन जाएं या एंकर...पर्दे पर दिखने की चाहत ने पत्रकारिता का बेड़ा गर्क कर रखा है...पहले पत्रकार इंस्टीट्यूट्स में नहीं, अखबारों के दफ्तर में बनते थे...बतौर ट्रेनी भर्ती होते थे...एक साल तक अलग-अलग डेस्क पर खूब रगड़ घिसाई होती थी...हेडलाइन लगाना सीखते थे...लेकिन अब सोर्स हो तो इनका कोई मतलब नहीं...इंटर्न के तौर पर भर्ती हो जाओ...फिर अपनी काबिलियत (खासकर चरणवंदना) से ट्रेनी बनो और इसी तरह आगे बढ़ते रहो...लेकिन डेस्क में जो हैं, उनकी मुसीबत इन अधकचरे रिपोर्टर और एंकर कितनी बढ़ाते हैं ये तो वही जानता है जिसके पैर में बिवाई पड़ी हो यानी डेस्क वाला...दिल्ली में एक बार एक रिपोर्टर ने तब के गृह मंत्री इंद्रजीत गुप्त की बाइट लेने के बाद उनकी पहचान पूछी थी...ये किस्सा वहां के पत्रकारों में खूब चर्चित हुआ था...आम तौर पर एंकर किसी मातम वाले घर का माहौल पूछता या पूछती दिखती है...पहला सवाल होता है, क्या माहौल है ? एक बार कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्यूरिटी की बैठक हो रही थी...तब दीपक चौरसिया आज तक में थे...एंकर ने सवाल पूछा, बताइए दीपक, बैठक में क्या चर्चा हो रही है ? दीपक का जवाब था...मैं मीटिंग में नहीं हूं...मीटिंग के बाद पता चलेगा...
साफ है एंकर या रिपोर्टर जानकारी विहीन है...ऐसे रिपोर्टर हर जगह हैं...और पत्रकारिता को गर्त में ले जा रहे हैं...झुंझलाहट होती है, जब मेरे जैसा डेस्क का आदमी ये देखता है कि रिपोर्टर मैदान से आता है...अपना टेप पटकता है...स्क्रिप्ट के नाम पर टेप का लॉग दे देता है और चल देता है...उसे कहने वाला कोई नहीं...लॉग भी ऐसा कि असली बाइट तो होती ही नहीं...फिर डांट खाता है डेस्क वाला...अमूमन यही कहा जाता है कि रिपोर्टर ने लॉग दिया था, लेकिन टेप आपने क्यों नहीं देखा ?...कहा जाता है, आप लोग मेहनत नहीं करना चाहते...पिछले करीब छह साल से मैं भी यही सुन रहा हूं और डेस्क के अपने साथियों को भी यही सुनते देख रहा हूं...
रिपोर्टर मज़े ले रहा है और डेस्क वालों की किस्मत में रोज़ यही सुनने की सज़ा लिखी हुई है...नए-नए बने रिपोर्टर तो माशा अल्लाह हैं ही, कुछ बड़े रिपोर्टर भी महानता की इस सीढ़ी पर खड़े हैं...एक बड़े रिपोर्टर ने एक पर्सनालिटी के बारे में फोन पर बताया कि वो कोमा में है...ब्रेकिंग चल गई...दूसरा चैनल बताने लगा कि पर्सनालिटी की हालत ठीक है...उसे अस्पताल से छुट्टी मिल जाएगी...यह बात जब उस बड़े रिपोर्टर को बताई गई तो उसने कहा, ठीक है ब्रेकिंग गिरा दीजिए...ये कैसी ब्रेकिंग थी भाई ? पूछने की हिम्मत कौन करे...क्योंकि रिपोर्टर और एंकर ही तो चैनल के चेहरे हैं...डेस्क वाले को कोई नहीं जानता...

February 25, 2009

ऑस्कर का बाज़ार

आखिरकार स्लमडॉग ने दस में से आठ ऑस्कर बटोर ही लिए...कोडक थियेटर में हंसते-खिलखिलाते और खुशी के आंसू छलकाते फिल्म के क्रू, खासकर मुंबई की झुग्गियों से लॉस एंजेलेस पहुंचे बच्चों को खुश देखकर अच्छा लगा...ये खुशी बरकरार रहे...अब आता हूं असली मुद्दे पर...आप सोच रहे होंगे कि ये ऑस्कर का बाज़ार क्या होता है ? जी हां, होता है...ठीक उसी तरह जैसे सुष्मिता सेन और प्रियंका चोपड़ा के मिस यूनिवर्स और ऐश्वर्या के मिस वर्ल्ड बनने से भी बाज़ार बना...आप कहेंगे कैस ? ध्यान दीजिए...इन सौंदर्य प्रतियोगिताओं को जीतने के बाद तीनों ने जिन प्रोडक्ट्स को एनडोर्स किया है, उनमें से कितना हम आप खरीद रहे हैं...साबुन से लेकर तेल तक और न जाने क्या-क्या...अब भारत ऑस्कर का बाज़ार बनेगा...बताता हूं कैसे...किसे ऑस्कर मिला ? सबको पता है...ए.आर. रहमान और रेसुल पोकुट्टी को...एक को म्यूज़िक के लिए और दूसरे को साउंड मिक्सिंग के लिए...यानी हॉलीवुड के दरवाज़े इन दोनों के लिए खुल गए...दोनों खुश होंगे और होना भी चाहिए...लेकिन इसके पीछे की कहानी कुछ और ही होगी...दोनों को हॉलीवुड के प्रोडक्शन हाउसेज़ से खूब काम मिलेगा, पर असल सवाल ये कि नकद नारायण कितना मिलेगा ? क्या डैनी बॉयल बताएंगे कि जिन तीन साउंड इंजीनियर्स को ऑस्कर मिला, उन सभी को एक जैसा अमाउंट उन्होंने दिया है ? क्या वो बताएंगे कि रहमान को इस फिल्म में म्यूज़िक देने और गुलज़ार से गाने लिखवाने के लिए क्या उतनी ही रकम दी गई, जितनी हॉलीवुड के किसी अमेरिकी म्यूज़िक डायरेक्टर और सांग राइटर को मिलती है ? तो अब आपकी समझ में आ गया होगा कि मैंने इस पोस्ट का नाम ऑस्कर का बाज़ार क्यों रखा है...आने वाले दिनों में बॉलीवुड के टेक्नीशियनों को हॉलीवुड जाने और काम करने का मौका मिलने वाला है...क्योंकि ऑस्कर ने ये तय कर दिया है कि यहां टैलेंट की कमी नहीं है...लेकिन सस्ता टैलेंट...यानी बाज़ार में कई कबीर लुकाठी हाथ में लिए खड़े हैं...कबीर हैं तो ज़्यादा की मांग तो करेंगे नहीं, बस कभी-कभार कोई ट्रॉफी मिलती रहे...इसी में हम खुश हैं कि चलो इंटरनेशनल एरीना में पहचान तो बन रही है...दाना-पानी तो घर में मिलता ही रहेगा...

February 21, 2009

बलिहारी इस अंग्रेज़ी ज्ञान की

काफी दिनों से इस मुद्दे पर कुछ लिखने की सोच रहा था...लेकिन दफ्तर में काम कुछ हल्का होने की वजह से आज मौका मिला है...मुद्दा है स्लमडॉग मिलेनेयर नाम की फिल्म...स्लम यानी झोपड़पट्टी...जैसी अपने मुंबई में धारावी है...बताता चलूं कि धारावी एशिया का सबसे बड़ा स्लम है...खैर, मैं स्लम की व्याख्या करने नहीं बैठा हूं...स्लमडॉग का विरोध करने वालों के अंग्रेज़ी ज्ञान पर अचरज जता रहा हूं...विरोध करने वालों की तादाद कम नहीं है...विरोध का ताज़ा उदाहरण हैं फिल्मों में म्यूज़िक देने वाले आदेश श्रीवास्तव...आदेश का कहना है कि फिल्म बनने के बाद पूरी दुनिया भारत को झुग्गियों का देश मानने लगी है और हम कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं हैं...मुझे ये नहीं पता कि आदेश श्रीवास्तव से क्या इस बारे में किसी ने कुछ कहा है...पहली बात तो ये कि अगर इस मसले पर कोई टिप्पणी करता है, यानी स्लम में रहने वालों को डॉग यानी कुत्ता कहता है तो मेरे हिसाब से उसे अंग्रेज़ी आती ही नहीं...अंग्रेज़ी जानने वाला इस तरह की बात कह ही नहीं सकता...जिन्होंने अंग्रेज़ी पढ़ी है, उन्होंने कई बार अंडरडॉग शब्द का इस्तेमाल होते देखा होगा...इस शब्द का खूब इस्तेमाल होता है और इसे उसके लिए इस्तेमाल किया जाता है, जिसके बारे में ये अंदाज़ा नहीं होता कि वो कोई कमाल कर सकता है...आम तौर पर किसी प्रतियोगिता में अगर कोई खिलाड़ी रैंकिंग में सबसे पीछे हो, लेकिन वो प्रतियोगिता जीत ले तो इस शब्द का इस्तेमाल किया जाता है...आदेश और इस फिल्म का इस वजह से विरोध करने वालों ने शायद इस पर कभी गौर नहीं किया...सानिया मिर्ज़ा को कई बार टेनिस टूर्नामेंट्स में अंडरडॉग बताया गया...सानिया तो कभी नहीं बिदकीं...दुनिया के बड़े खिलाड़ी और फिल्म स्टार्स को भी अंडरडॉग कहा गया....वे भी नहीं बिदके...अगर कोई फिल्म ऑस्कर में जाती है और उसे अवॉर्ड न मिलने की उम्मीद के बावजूद बेस्ट फिल्म का अवॉर्ड मिल जाए तो कहा यही जाएगा कि UNDERDOG ---FILM WENT ON TO FETCH OSCAR. तो अब स्लमडॉग पर इतनी हाय तौबा क्यों...फिल्म का विरोध करने वालों को इसकी थीम को देखना चाहिए...थीम ये कि किस तरह झुग्गी में रहने वाला एक लड़का एक करोड़ रुपए जीतकर अपनी जिंदगी संवारता है...मुझे जितनी अंग्रेज़ी आती है...उसके हिसाब से तो यही है...स्लमडॉग गाली नहीं है...और अगर कोई आदेश जी से इस बारे में कुछ कहता है तो उन्हें भी उस शख्स को बता देना चाहिए कि स्लमडॉग का मतलब क्या होता है....उसे ये भी बताना चाहिए कि डॉग का मतलब भले ही कुत्ता होता हो, लेकिन स्लमडॉग और अंडरडॉग का मतलब कुछ और है...फिल्म नमक हलाल में अमिताभ बच्चन ने बोला भी था कि इंग्लिश इज़ ए वेरी फनी लैंग्वेज...वाकई इसमें DOOR का PRONUNCIATION डोर होता है, लेकिन POOR को पुअर बोलते हैं...

February 20, 2009

गंगा बहती हो क्यों...

मेरे पास एक ई-मेल आया है...न्यू सेवेन वंडर्स वालों का...जब भी ये संगठन कोई प्रतियोगिता कराता है...इसकी प्रवक्ता टिया मुझे ई-मेल करती है...फिलहाल ये संगठन न्यू सेवेन वंडर्स ऑफ नेचर प्रतियोगिता करा रहा है...गुरुवार यानी 19 फरवरी को टिया वियरिंग ने एक ई-मेल भेजा...मेल पढ़ा तो चौंका...वजह ये कि इस प्रतियोगिता से अपने देश और इसकी सभ्यता की गवाह रही गंगा नदी बाहर होने की कगार पर है...गौरतलब है कि न्यू सेवेन वंडर्स में ताजमहल ने जगह बनाई थी, लेकिन भारत की ही गंगा अगर सेवेन वंडर्स ऑफ नेचर से बाहर हो जाए तो अचरज तो होगा ही...ताजमहल को भारतीयों और यहां तक कि एन.आर.आई. ने खूब वोट दिए थे और टॉप सेवेन वंडर्स में शामिल करा दिया था...ई-मेल पढ़ने पर मुझे पता चला कि गंगा फिलहाल टॉप 77 वंडर्स के नॉमिनेशन में शामिल है और अपने ग्रुप में उसने नियाग्रा प्रपात को भी पछाड़ते हुए पहला स्थान हासिल कर रखा है...तो आप सोच रहे होंगे कि आखिर गंगा कैसे प्रतियोगिता से बाहर हो सकती है...वजह ये है कि इसे ऑफिशियल सपोर्ट नहीं मिला हुआ है...इस सपोर्ट के बगैर कोई भी एंट्री बाहर हो जाती है...भले ही उसे कितने ही वोट क्यों न मिल रहे हों...तो क्या सरकार इस पर गौर कर रही है...गंगा की हालत वैसे तो किसी से छिपी नहीं है...कई शहरों में इसे नदी की जगह गंदे नाले का रूप मिला हुआ है...सरकार इस ओर भी ध्यान नहीं देती...ऐसे में अगर सेवेन वंडर्स में टॉप पर चल रही गंगा की ओर उसका ध्यान नहीं गया है तो इस पर क्या कहा जा सकता है...

February 18, 2009

तालमेल या घालमेल ?

यह ख़बर चौंकाने वाली है...चौंकाने वाली इसलिए क्योंकि चुम्बक के दो ध्रुवों के पास आने जैसा मामला है...ख़बर है सपा और भाजपा के बीच चुनावी तालमेल की...तालमेल की बात सपा प्रमुख मुलायम सिंह कर रहे हैं...उनकी कुछ शर्तें भाजपा वाले मान लें तो इस बार होने वाले चुनावी महासमर में साइकिल पर बैठा शख्स हाथ में कमल और कमल को दशकों से हाथ में पकड़ने वाला साइकिल की तारीफ़ के पुल बांधता दिखेगा...लेकिन यह राजनीति का कौन सा रूप है...यह सवाल इसलिए उठता है क्योंकि दोनों ही पार्टियां पिछले 18 साल से एक दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहातीं...हालांकि मुलायम सिंह को बतौर यूपी का मुख्यमंत्री बनने के लिए भाजपा ने भी बाहर से सहयोग दिया था...लेकिन अयोध्या आंदोलन के दौरान ये रिश्ते जो बिगड़े...वे अब तक सुधरे नहीं थे...मुलायम का कहना है कि उन्होंने तालमेल पर लालकृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी से भी बात कर ली है...बस शर्तें राह में आड़े आ रही हैं...दूसरा सवाल ये कि अगर यह बातचीत काफी समय से चल रही है तो फिर संसद और यूपी की विधानसभा में नूराकुश्ती क्यों हो रही थी...तो क्या सब कुछ प्लान्ड था...फ्लैशबैक में जाते हैं...याद कीजिए कि परमाणु करार के मामले में क्या हुआ था...वामपंथी साथ छोड़ गए तो मुलायम आ गए थे संप्रग के साथ...जिन्हें तब टीवी पर दिखाए जाने वाले सीन याद हैं, उन्हें यह भी याद होगा कि भाजपा कैसे इस करार का उतना विरोध नहीं कर रही थी, जैसा वो संप्रग सरकार के हर कदम का अब तक करती रही है...तो क्या भाजपा और सपा के बीच तभी से नए मेल का सूत्रपात हो चुका था...इस सवाल का जवाब तो मुलायम सिंह और आडवाणी-वाजपेयी ही दे सकते हैं...फिलहाल अगर ये तालमेल हो गया तो चुनावी समर के नतीजे दोनों पार्टियों की दशा दिशा तय करने वाले ज़रूर होंगे...वजह यह कि अयोध्या के विवादित ढांचे को गिराने के आरोपित कल्याण सिंह के बेटे राजवीर को सपा में लेने का सपा के ही मुसलमान नेता विरोध कर रहे हैं...मुलायम और अमर सिंह हालांकि दलील दे रहे हैं कि कल्याण तो सपा में हैं ही नहीं, बाहर से समर्थन कर रहे हैं...राजवीर का ढांचा तोड़ने से कोई लेना देना है नहीं...लेकिन अगर भाजपा से पैक्ट हो जाता है तो देखना ये होगा कि इसे जायज़ ठहराने के लिए सपा के धुरंधर नेता क्या तर्क देते हैं...सवाल ये भी उठ रहा है कि भाजपा से सपा का तालमेल हो गया तो कल्याण सिंह का क्या होगा...अटल और आडवाणी का विरोध कर भाजपा से गए और फिर लौटे कल्याण सिंह ने इस बार ये कहते हुए भाजपा छोड़ी कि उन्हें यूपी की सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाने वाली पार्टी को खत्म करना ही उनका लक्ष्य है...अंतिम सवाल ये कि अलग अलग एक्सपेरीमेंट में माया और राम दोनों ही खो चुके भाजपा को क्या इस तालमेल से संजीवनी मिलेगी...अगर मुसलमान वोटर को इस तालमेल में घालमेल नज़र आया तो हाथी (बसपा) के पैरों तले साइकिल भी टूटेगी और कमल भी कुचल जाएगा...यह सच है कि दिल्ली की सत्ता की राह यूपी से होकर जाती है...साइकिल और कमल को हाथी ने नुकसान पहुंचाया तो आडवाणी जी आगे भी लोकसभा में स्पीकर के बाईं ओर बैठे नज़र आएंगे...रही बात मुलायम की तो उन पर से लाल झंडे वालों का भरोसा तो उठ ही गया है...हालांकि राजनीति का मतलब यह होता है कि न कोई हमेशा दोस्त होता है और न ही दुश्मन...सपा और भाजपा के एक दूसरे की ओर बढ़े हाथ इसका सबूत हैं...लेकिन मुलायम से क्या कभी हाथ मिलाने से पहले कांग्रेस जैसी दूसरी पार्टियां कम से कम दो बार नहीं सोचेंगी...ये तो वक्त ही बताएगा क्योंकि राजनीति कब कौन सी करवट बैठे कोई कह नहीं सकता...फिलहाल तो मायावती के पास मौका है कि वो कह सकें कि देखो, मैं कहती न थी कि सपा और भाजपा के बीच अंदर ही अंदर खिचड़ी पक रही है...ये तो दिखाने के लिए ही लड़ते रहते हैं...

मार डालेगी ये चमक

सोणा किन्ना सोणा है, सोणे जैसा तेरा मन...गाने के बोल बहुत अच्छे हैं...लेकिन सोणा यानी सोना खरीदने के लिए अब लोगों को मन मारना पड़ रहा है...15 हजारी हो गया है सोना और बाज़ार पर नज़र रखने वाले पहले ही भविष्यवाणी कर चुके हैं कि इस साल के खत्म होते होते ये 19 हज़ार के स्तर को पार कर जाएगा...जिस वक्त ब्लॉग में ये सब लिख रहा हूं...सहालग यानी शादी विवाह का दौर चल रहा है...आसमान में शुक्र ग्रह चमक रहा है और जमीन पर सोने की चमक आंखों को चुंधिया रही है...मिचमिचाती आंखों से लोग सवाल पूछ रहे हैं...सवाल ये है कि करीब एक साल से रिकॉर्ड पर रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच रहे सोने को खरीदने वाले कम हैं...तो इसकी कीमत बढ़ने की वजह क्या है...हम बताए देते हैं...ज़रा लंदन, न्यूयॉर्क और अपने देश के मुंबई पर नज़र डालें...लंदन और न्यूयॉर्क में शुरू हुए वायदा कारोबार ने एम.सी.एक्स. और एन.सी.डी.एक्स. के ज़रिए भारत में प्रवेश किया है...कल यानी 17 फरवरी 2009 को सोना जब रिकॉर्ड 15 हजारी बना तो उससे ठीक पहले मैं एम.सी.एक्स. की वेबसाइट पर गया था...सोने के वायदा भाव तब 14 हजार सात सौ रुपए से कुछ ज्यादा थे...इसके घंटे भर बाद ही सोने ने नया रिकॉर्ड बनाया...तो क्या वायदा कारोबार की वजह से ही आवश्यक जिंसों की तरह ही सोने के भाव भी आसमान छू रहे हैं...क्या इस वायदा कारोबार से कुछ लोग फायदा उठा रहे हैं...जांच होनी चाहिए...संप्रग सरकार को समर्थन देते रहे वामपंथी भी ये आरोप लगाते रहे हैं कि वायदा कारोबार की वजह से ही आम आदमी और उसके परिवार को आधे पेट रहना पड़ता है...लाल झंडे वालों ने इसकी जांच की मांग भी की थी...लेकिन जांच हुई नहीं...सवाल ये भी है कि दुनिया में सोने के सबसे बड़े उत्पादक दक्षिण अफ्रीका में इसके नए खदान भी मिल गए हैं...ढेर सारा सोना निकल रहा है वहां से...तो फिर पूरी दुनिया में ये पीली धातु लोगों की पेशानी पर पसीना क्यों ला रही है...खैर, मार डालने वाली चमक बिखेर रहे सोने ने हाल बेहाल कर रखा है...बाप अपनी बेटी की शादी में सोने के ज़ेवर देने से पहले माथे पर आया पसीना पोंछ रहा है...अपने बारे में बताऊं तो अप्रैल के अंत या मई की शुरुआत में मेरे घर में भी नया मेहमान आने वाला है...पहले सोचा था कि लड़की होगी तो उसके गहनों के लिए सोने की व्यवस्था अभी से करना शुरू करूंगा...लेकिन हालात देख हिम्मत नहीं पड़ रही...सोने की चमक दिल की धड़कनें बढ़ा रही है...अगर 19 हज़ारी चमक इसने बिखेरी तो शायद बहुतों की जान निकल जाए...तो दुआ यही कीजिए कि सोना, फिर से सोणा हो जाए...ताकि लोगों को अपना मन न मारना पड़े...

February 17, 2009

ज़िन्दा लाश

कैसे कहते हो कि मैं ज़िन्दा नहीं हूं...

मैं सांस लेता हूं...

मैं अपनी पलकों को बंद करता हूं और खोलता हूं बार-बार...

मैं भूखे पेट नहीं रह सकता...

तो क्यों कहा जाता है कि मैं चलती-फिरती लाश हूं...

इसलिए, क्योंकि मैं कर लेता हूं अपने कान बंद...

आंखों को ढंक लेता हूं अपनी हथेलियों से...

और मुंह बंद रखने में समझता हूं अपनी भलाई...

जब भी होता है कहीं किसी के साथ गलत...

February 16, 2009

मंदी का खेल

मंदी...मंदी...मंदी...चारों ओर आजकल यही सुनने को मिलता है...लेकिन लाख टके का सवाल ये कि मंदी क्या वाकई उतनी है, जितना इसके बारे में कहा जा रहा है ? खासकर मीडिया में मंदी के नाम पर जो हो रहा है...यानी नौकरियां जा रही हैं, उस पर कुछ सवाल मेरे एक मित्र ने पूछे...ये सवाल करोड़ टके के हैं...पहला सवाल ये कि मंदी के नाम पर मीडिया में ऐड में कितनी कमी आई है...क्योंकि अखबारों के पन्ने और टीवी के स्क्रीन पर तो ऐड की कमी दिखती नहीं...दूसरा सवाल ये कि ऐड कम नहीं हुए तो क्या उनके रेट कम हुए हैं...तीसरा सवाल ये कि मंदी की मार भारत में ज्यादा नहीं है...पश्चिमी देशों की अर्थव्यवस्था खस्ताहाल है...तो भारतीय मीडिया में ऐड का कितना हिस्सा विदेशी होता है या मल्टीनेशनल कंपनीज का ऐड मीडिया में आता है...जाहिर है इन सवालों के जवाब न मिले हैं और शायद मिलेंगे भी नहीं...लेकिन मीडिया से ही जुड़े इस दोस्त के सवालों से इसी दुनिया के कई साथी इत्तफाक रखते हैं...खासकर इस वजह से कि वित्त मंत्रालय संभाल चुके और फिलहाल गृह मंत्रालय संभाल रहे पी. चिदम्बरम भी कह चुके हैं कि भारत पर मंदी का असर नहीं है...यानी मंदी की मार कह कर रो रहे लोग झूठ बोल रहे हैं या सरकार छिपा रही है...खैर, उम्मीद यही है कि इस मंदी (तथाकथित या सही) से निजात मिलेगी और मीडिया से जुड़े लोगों का निवाला नहीं छिनेगा...

February 10, 2009

बंदूकबाज़

वो 12वीं तक पढ़ गया...बाप का साया पहले ही सिर से उठ चुका था...घरों में चौका-चूल्हा करके मां किसी तरह पढ़ाती रही...पर मां अब बूढ़ी हो रही है...बेटा बेकार है...घर में अब संपत्ति के नाम पर सिर्फ बर्तन बचे हैं...एक दिन मां बोली- देखो कहीं नौकरी मिले तो बेहतर...12वीं पास को नौकरी मिलती तो है, लेकिन घूस ! वो कहां से लाए...बर्तन-भांडे बेचकर लाखों रुपए तो आने से रहे...चाय पीने निकल जाता है वो...चाय की चुस्की के साथ अखबार....एक जगह नौकरी का ऐड निकला है...गार्ड चाहिए...पगार 3000 रुपए महीना...रहना, खाना मुफ्त...बंदूक हो तो पगार डेढ़ हज़ार रुपए ज़्यादा...गिलास में चाय आधी रह जाती है...वो घर की ओर दौड़ पड़ता है...मां खाना बना रही है...बेटा, आ खाना खा ले....पर बेटे को भूख नहीं है...नौकरी उसका इंतज़ार कर रही है...मां को वो बताता है....बंदूक मिल जाए तो साढ़े चार हज़ार रुपए हर महीने...लोहे का पुराना संदूक खुलता है...कांसे के कुछ बर्तन और बचे-खुचे गहने निकलते हैं...बिकता है ये सब...आर्म्स लाइसेंस बड़ी मशक्कत से मिलता है...उसमें भी काफी कुछ चला जाता है...लेकिन चलो, ठीक है, आने वाला समय बेहतर है...नौकरी मिली तो मां को गहने बनवाकर दे दूंगा...लाइसेंस हाथ में आते ही वो दौड़ पड़ता है बंदूक की दुकान की ओर....फिर हज़ारों रुपए खर्च...बंदूक लेकर शान से घर लौटता है और सुबह की बस से चल देता है शहर की ओर...गार्ड की नौकरी पक्की...वर्दी, जूता, कैप...वाह, पूरे ठाठ हैं...उग रही मूंछों को ताव देता वो कंधे पर बंदूक टांगे खुद को दुनिया का सबसे सुखी इन्सान समझ रहा है...ड्यूटी बैंक में लगी है....महीना बीतता है...साढ़े चार हज़ार मिलते हैं...दो हज़ार तुरंत मां को मनीऑर्डर....मां कितनी खुश होगी...अब घरों में उसे चौका-चूल्हा नहीं करना होगा...जूठे बर्तन नहीं धोने होंगे....आज नींद अच्छी आएगी....लेकिन ये क्या !!! ये कौन लोग हैं...चेहरा ढंका हुआ...काले शीशों वाली कार से उतरते ही दौड़े चले आ रहे हैं बैंक की ओर...वो बंदूक संभालता है...लेकिन गोली चला नहीं पाता...सिर पर आ धमकते हैं वे....छीन लेते हैं उसकी बंदूक और बांध देते हैं मुश्कें...गूं-गूं की आवाज़ ही उसके मुंह से निकलती है और देखते ही देखते बैंक में रखा एक-एक नोट लेकर वो लोग भाग जाते हैं...पुलिस आती है...पूछती है उससे कि क्यों नहीं चला सका वो गोली...क्यों नहीं लड़ा वो लुटेरों से...रात भर थाने में पूछताछ...एक मिनट भी सोने नहीं देते वो....सुबह छूटता है तो जाता है अपने दफ्तर...वहां से भी थैंक्यू कह दिया गया...अब घर का ही सहारा है...बस खड़ी है...वो बैठ जाता है....घर पहुंचता है लुटी पिटी हालत में....बेटे को तो कभी ऐसा नहीं देखा...मां दौड़ी आती है...बेटा, क्या हुआ ? को कीहिस तोहार ई हाल ? उसकी ज़ुबान तालू से लग चुकी है...जीभ चल नहीं रही...इतना ही मुंह से निकलता है....अम्मा, वहू लै गा....

पत्ता

पत्ता गिरा पेड़ से
और बह चला पानी में
कड़कड़ाती ठंड थी
गुनगुनी धूप सेंक रहा था एक आदमी
उसने देखा बहते पत्ते को कांपते
आदमी ने उठाया और पोंछा अपने जिस्म से पत्ते को
रख दिया उसे गुनगुनी धूप में
पत्ते ने कहा- इन्सानियत अभी जिंदा है...