पत्रकारिता के लिए भीड़ लगी है...इंस्टीट्यूट्स खुले हुए हैं...लाखों की फीस देकर लोग पत्रकार बन रहे हैं...हर साल हज़ारों पत्रकार ये इंस्टीट्यूट्स पैदा कर रहे हैं...लेकिन ये पत्रकार किसी काम के नहीं...इनका पढ़ने-लिखने से कोई मतलब नहीं...पढ़ने लिखने से मतलब नहीं है सो जानकारी भी नहीं...हर साल जो हज़ारों लोग डिप्लोमा लेकर इस मैदान में उतरते हैं, उनमें से ज़्यादातर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की ओर रुख करते हैं...बस एक ही तमन्ना...या तो रिपोर्टर बन जाएं या एंकर...पर्दे पर दिखने की चाहत ने पत्रकारिता का बेड़ा गर्क कर रखा है...पहले पत्रकार इंस्टीट्यूट्स में नहीं, अखबारों के दफ्तर में बनते थे...बतौर ट्रेनी भर्ती होते थे...एक साल तक अलग-अलग डेस्क पर खूब रगड़ घिसाई होती थी...हेडलाइन लगाना सीखते थे...लेकिन अब सोर्स हो तो इनका कोई मतलब नहीं...इंटर्न के तौर पर भर्ती हो जाओ...फिर अपनी काबिलियत (खासकर चरणवंदना) से ट्रेनी बनो और इसी तरह आगे बढ़ते रहो...लेकिन डेस्क में जो हैं, उनकी मुसीबत इन अधकचरे रिपोर्टर और एंकर कितनी बढ़ाते हैं ये तो वही जानता है जिसके पैर में बिवाई पड़ी हो यानी डेस्क वाला...दिल्ली में एक बार एक रिपोर्टर ने तब के गृह मंत्री इंद्रजीत गुप्त की बाइट लेने के बाद उनकी पहचान पूछी थी...ये किस्सा वहां के पत्रकारों में खूब चर्चित हुआ था...आम तौर पर एंकर किसी मातम वाले घर का माहौल पूछता या पूछती दिखती है...पहला सवाल होता है, क्या माहौल है ? एक बार कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्यूरिटी की बैठक हो रही थी...तब दीपक चौरसिया आज तक में थे...एंकर ने सवाल पूछा, बताइए दीपक, बैठक में क्या चर्चा हो रही है ? दीपक का जवाब था...मैं मीटिंग में नहीं हूं...मीटिंग के बाद पता चलेगा...
साफ है एंकर या रिपोर्टर जानकारी विहीन है...ऐसे रिपोर्टर हर जगह हैं...और पत्रकारिता को गर्त में ले जा रहे हैं...झुंझलाहट होती है, जब मेरे जैसा डेस्क का आदमी ये देखता है कि रिपोर्टर मैदान से आता है...अपना टेप पटकता है...स्क्रिप्ट के नाम पर टेप का लॉग दे देता है और चल देता है...उसे कहने वाला कोई नहीं...लॉग भी ऐसा कि असली बाइट तो होती ही नहीं...फिर डांट खाता है डेस्क वाला...अमूमन यही कहा जाता है कि रिपोर्टर ने लॉग दिया था, लेकिन टेप आपने क्यों नहीं देखा ?...कहा जाता है, आप लोग मेहनत नहीं करना चाहते...पिछले करीब छह साल से मैं भी यही सुन रहा हूं और डेस्क के अपने साथियों को भी यही सुनते देख रहा हूं...
रिपोर्टर मज़े ले रहा है और डेस्क वालों की किस्मत में रोज़ यही सुनने की सज़ा लिखी हुई है...नए-नए बने रिपोर्टर तो माशा अल्लाह हैं ही, कुछ बड़े रिपोर्टर भी महानता की इस सीढ़ी पर खड़े हैं...एक बड़े रिपोर्टर ने एक पर्सनालिटी के बारे में फोन पर बताया कि वो कोमा में है...ब्रेकिंग चल गई...दूसरा चैनल बताने लगा कि पर्सनालिटी की हालत ठीक है...उसे अस्पताल से छुट्टी मिल जाएगी...यह बात जब उस बड़े रिपोर्टर को बताई गई तो उसने कहा, ठीक है ब्रेकिंग गिरा दीजिए...ये कैसी ब्रेकिंग थी भाई ? पूछने की हिम्मत कौन करे...क्योंकि रिपोर्टर और एंकर ही तो चैनल के चेहरे हैं...डेस्क वाले को कोई नहीं जानता...
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I guess it is too early to pinpoint fresh recruits to media industry as worthless. They can work together with those who may not have got the opportunity to go to specific colleges offering training in journalism.It is upto the media group Manager to see that each group gets benefitted from the other, instead of finding faults in one another.
ReplyDeleteA Well-wisher...