February 16, 2009
मंदी का खेल
मंदी...मंदी...मंदी...चारों ओर आजकल यही सुनने को मिलता है...लेकिन लाख टके का सवाल ये कि मंदी क्या वाकई उतनी है, जितना इसके बारे में कहा जा रहा है ? खासकर मीडिया में मंदी के नाम पर जो हो रहा है...यानी नौकरियां जा रही हैं, उस पर कुछ सवाल मेरे एक मित्र ने पूछे...ये सवाल करोड़ टके के हैं...पहला सवाल ये कि मंदी के नाम पर मीडिया में ऐड में कितनी कमी आई है...क्योंकि अखबारों के पन्ने और टीवी के स्क्रीन पर तो ऐड की कमी दिखती नहीं...दूसरा सवाल ये कि ऐड कम नहीं हुए तो क्या उनके रेट कम हुए हैं...तीसरा सवाल ये कि मंदी की मार भारत में ज्यादा नहीं है...पश्चिमी देशों की अर्थव्यवस्था खस्ताहाल है...तो भारतीय मीडिया में ऐड का कितना हिस्सा विदेशी होता है या मल्टीनेशनल कंपनीज का ऐड मीडिया में आता है...जाहिर है इन सवालों के जवाब न मिले हैं और शायद मिलेंगे भी नहीं...लेकिन मीडिया से ही जुड़े इस दोस्त के सवालों से इसी दुनिया के कई साथी इत्तफाक रखते हैं...खासकर इस वजह से कि वित्त मंत्रालय संभाल चुके और फिलहाल गृह मंत्रालय संभाल रहे पी. चिदम्बरम भी कह चुके हैं कि भारत पर मंदी का असर नहीं है...यानी मंदी की मार कह कर रो रहे लोग झूठ बोल रहे हैं या सरकार छिपा रही है...खैर, उम्मीद यही है कि इस मंदी (तथाकथित या सही) से निजात मिलेगी और मीडिया से जुड़े लोगों का निवाला नहीं छिनेगा...
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