February 25, 2009
ऑस्कर का बाज़ार
आखिरकार स्लमडॉग ने दस में से आठ ऑस्कर बटोर ही लिए...कोडक थियेटर में हंसते-खिलखिलाते और खुशी के आंसू छलकाते फिल्म के क्रू, खासकर मुंबई की झुग्गियों से लॉस एंजेलेस पहुंचे बच्चों को खुश देखकर अच्छा लगा...ये खुशी बरकरार रहे...अब आता हूं असली मुद्दे पर...आप सोच रहे होंगे कि ये ऑस्कर का बाज़ार क्या होता है ? जी हां, होता है...ठीक उसी तरह जैसे सुष्मिता सेन और प्रियंका चोपड़ा के मिस यूनिवर्स और ऐश्वर्या के मिस वर्ल्ड बनने से भी बाज़ार बना...आप कहेंगे कैस ? ध्यान दीजिए...इन सौंदर्य प्रतियोगिताओं को जीतने के बाद तीनों ने जिन प्रोडक्ट्स को एनडोर्स किया है, उनमें से कितना हम आप खरीद रहे हैं...साबुन से लेकर तेल तक और न जाने क्या-क्या...अब भारत ऑस्कर का बाज़ार बनेगा...बताता हूं कैसे...किसे ऑस्कर मिला ? सबको पता है...ए.आर. रहमान और रेसुल पोकुट्टी को...एक को म्यूज़िक के लिए और दूसरे को साउंड मिक्सिंग के लिए...यानी हॉलीवुड के दरवाज़े इन दोनों के लिए खुल गए...दोनों खुश होंगे और होना भी चाहिए...लेकिन इसके पीछे की कहानी कुछ और ही होगी...दोनों को हॉलीवुड के प्रोडक्शन हाउसेज़ से खूब काम मिलेगा, पर असल सवाल ये कि नकद नारायण कितना मिलेगा ? क्या डैनी बॉयल बताएंगे कि जिन तीन साउंड इंजीनियर्स को ऑस्कर मिला, उन सभी को एक जैसा अमाउंट उन्होंने दिया है ? क्या वो बताएंगे कि रहमान को इस फिल्म में म्यूज़िक देने और गुलज़ार से गाने लिखवाने के लिए क्या उतनी ही रकम दी गई, जितनी हॉलीवुड के किसी अमेरिकी म्यूज़िक डायरेक्टर और सांग राइटर को मिलती है ? तो अब आपकी समझ में आ गया होगा कि मैंने इस पोस्ट का नाम ऑस्कर का बाज़ार क्यों रखा है...आने वाले दिनों में बॉलीवुड के टेक्नीशियनों को हॉलीवुड जाने और काम करने का मौका मिलने वाला है...क्योंकि ऑस्कर ने ये तय कर दिया है कि यहां टैलेंट की कमी नहीं है...लेकिन सस्ता टैलेंट...यानी बाज़ार में कई कबीर लुकाठी हाथ में लिए खड़े हैं...कबीर हैं तो ज़्यादा की मांग तो करेंगे नहीं, बस कभी-कभार कोई ट्रॉफी मिलती रहे...इसी में हम खुश हैं कि चलो इंटरनेशनल एरीना में पहचान तो बन रही है...दाना-पानी तो घर में मिलता ही रहेगा...
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सही कहा आपने
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