February 18, 2009

तालमेल या घालमेल ?

यह ख़बर चौंकाने वाली है...चौंकाने वाली इसलिए क्योंकि चुम्बक के दो ध्रुवों के पास आने जैसा मामला है...ख़बर है सपा और भाजपा के बीच चुनावी तालमेल की...तालमेल की बात सपा प्रमुख मुलायम सिंह कर रहे हैं...उनकी कुछ शर्तें भाजपा वाले मान लें तो इस बार होने वाले चुनावी महासमर में साइकिल पर बैठा शख्स हाथ में कमल और कमल को दशकों से हाथ में पकड़ने वाला साइकिल की तारीफ़ के पुल बांधता दिखेगा...लेकिन यह राजनीति का कौन सा रूप है...यह सवाल इसलिए उठता है क्योंकि दोनों ही पार्टियां पिछले 18 साल से एक दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहातीं...हालांकि मुलायम सिंह को बतौर यूपी का मुख्यमंत्री बनने के लिए भाजपा ने भी बाहर से सहयोग दिया था...लेकिन अयोध्या आंदोलन के दौरान ये रिश्ते जो बिगड़े...वे अब तक सुधरे नहीं थे...मुलायम का कहना है कि उन्होंने तालमेल पर लालकृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी से भी बात कर ली है...बस शर्तें राह में आड़े आ रही हैं...दूसरा सवाल ये कि अगर यह बातचीत काफी समय से चल रही है तो फिर संसद और यूपी की विधानसभा में नूराकुश्ती क्यों हो रही थी...तो क्या सब कुछ प्लान्ड था...फ्लैशबैक में जाते हैं...याद कीजिए कि परमाणु करार के मामले में क्या हुआ था...वामपंथी साथ छोड़ गए तो मुलायम आ गए थे संप्रग के साथ...जिन्हें तब टीवी पर दिखाए जाने वाले सीन याद हैं, उन्हें यह भी याद होगा कि भाजपा कैसे इस करार का उतना विरोध नहीं कर रही थी, जैसा वो संप्रग सरकार के हर कदम का अब तक करती रही है...तो क्या भाजपा और सपा के बीच तभी से नए मेल का सूत्रपात हो चुका था...इस सवाल का जवाब तो मुलायम सिंह और आडवाणी-वाजपेयी ही दे सकते हैं...फिलहाल अगर ये तालमेल हो गया तो चुनावी समर के नतीजे दोनों पार्टियों की दशा दिशा तय करने वाले ज़रूर होंगे...वजह यह कि अयोध्या के विवादित ढांचे को गिराने के आरोपित कल्याण सिंह के बेटे राजवीर को सपा में लेने का सपा के ही मुसलमान नेता विरोध कर रहे हैं...मुलायम और अमर सिंह हालांकि दलील दे रहे हैं कि कल्याण तो सपा में हैं ही नहीं, बाहर से समर्थन कर रहे हैं...राजवीर का ढांचा तोड़ने से कोई लेना देना है नहीं...लेकिन अगर भाजपा से पैक्ट हो जाता है तो देखना ये होगा कि इसे जायज़ ठहराने के लिए सपा के धुरंधर नेता क्या तर्क देते हैं...सवाल ये भी उठ रहा है कि भाजपा से सपा का तालमेल हो गया तो कल्याण सिंह का क्या होगा...अटल और आडवाणी का विरोध कर भाजपा से गए और फिर लौटे कल्याण सिंह ने इस बार ये कहते हुए भाजपा छोड़ी कि उन्हें यूपी की सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाने वाली पार्टी को खत्म करना ही उनका लक्ष्य है...अंतिम सवाल ये कि अलग अलग एक्सपेरीमेंट में माया और राम दोनों ही खो चुके भाजपा को क्या इस तालमेल से संजीवनी मिलेगी...अगर मुसलमान वोटर को इस तालमेल में घालमेल नज़र आया तो हाथी (बसपा) के पैरों तले साइकिल भी टूटेगी और कमल भी कुचल जाएगा...यह सच है कि दिल्ली की सत्ता की राह यूपी से होकर जाती है...साइकिल और कमल को हाथी ने नुकसान पहुंचाया तो आडवाणी जी आगे भी लोकसभा में स्पीकर के बाईं ओर बैठे नज़र आएंगे...रही बात मुलायम की तो उन पर से लाल झंडे वालों का भरोसा तो उठ ही गया है...हालांकि राजनीति का मतलब यह होता है कि न कोई हमेशा दोस्त होता है और न ही दुश्मन...सपा और भाजपा के एक दूसरे की ओर बढ़े हाथ इसका सबूत हैं...लेकिन मुलायम से क्या कभी हाथ मिलाने से पहले कांग्रेस जैसी दूसरी पार्टियां कम से कम दो बार नहीं सोचेंगी...ये तो वक्त ही बताएगा क्योंकि राजनीति कब कौन सी करवट बैठे कोई कह नहीं सकता...फिलहाल तो मायावती के पास मौका है कि वो कह सकें कि देखो, मैं कहती न थी कि सपा और भाजपा के बीच अंदर ही अंदर खिचड़ी पक रही है...ये तो दिखाने के लिए ही लड़ते रहते हैं...

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