February 10, 2009

बंदूकबाज़

वो 12वीं तक पढ़ गया...बाप का साया पहले ही सिर से उठ चुका था...घरों में चौका-चूल्हा करके मां किसी तरह पढ़ाती रही...पर मां अब बूढ़ी हो रही है...बेटा बेकार है...घर में अब संपत्ति के नाम पर सिर्फ बर्तन बचे हैं...एक दिन मां बोली- देखो कहीं नौकरी मिले तो बेहतर...12वीं पास को नौकरी मिलती तो है, लेकिन घूस ! वो कहां से लाए...बर्तन-भांडे बेचकर लाखों रुपए तो आने से रहे...चाय पीने निकल जाता है वो...चाय की चुस्की के साथ अखबार....एक जगह नौकरी का ऐड निकला है...गार्ड चाहिए...पगार 3000 रुपए महीना...रहना, खाना मुफ्त...बंदूक हो तो पगार डेढ़ हज़ार रुपए ज़्यादा...गिलास में चाय आधी रह जाती है...वो घर की ओर दौड़ पड़ता है...मां खाना बना रही है...बेटा, आ खाना खा ले....पर बेटे को भूख नहीं है...नौकरी उसका इंतज़ार कर रही है...मां को वो बताता है....बंदूक मिल जाए तो साढ़े चार हज़ार रुपए हर महीने...लोहे का पुराना संदूक खुलता है...कांसे के कुछ बर्तन और बचे-खुचे गहने निकलते हैं...बिकता है ये सब...आर्म्स लाइसेंस बड़ी मशक्कत से मिलता है...उसमें भी काफी कुछ चला जाता है...लेकिन चलो, ठीक है, आने वाला समय बेहतर है...नौकरी मिली तो मां को गहने बनवाकर दे दूंगा...लाइसेंस हाथ में आते ही वो दौड़ पड़ता है बंदूक की दुकान की ओर....फिर हज़ारों रुपए खर्च...बंदूक लेकर शान से घर लौटता है और सुबह की बस से चल देता है शहर की ओर...गार्ड की नौकरी पक्की...वर्दी, जूता, कैप...वाह, पूरे ठाठ हैं...उग रही मूंछों को ताव देता वो कंधे पर बंदूक टांगे खुद को दुनिया का सबसे सुखी इन्सान समझ रहा है...ड्यूटी बैंक में लगी है....महीना बीतता है...साढ़े चार हज़ार मिलते हैं...दो हज़ार तुरंत मां को मनीऑर्डर....मां कितनी खुश होगी...अब घरों में उसे चौका-चूल्हा नहीं करना होगा...जूठे बर्तन नहीं धोने होंगे....आज नींद अच्छी आएगी....लेकिन ये क्या !!! ये कौन लोग हैं...चेहरा ढंका हुआ...काले शीशों वाली कार से उतरते ही दौड़े चले आ रहे हैं बैंक की ओर...वो बंदूक संभालता है...लेकिन गोली चला नहीं पाता...सिर पर आ धमकते हैं वे....छीन लेते हैं उसकी बंदूक और बांध देते हैं मुश्कें...गूं-गूं की आवाज़ ही उसके मुंह से निकलती है और देखते ही देखते बैंक में रखा एक-एक नोट लेकर वो लोग भाग जाते हैं...पुलिस आती है...पूछती है उससे कि क्यों नहीं चला सका वो गोली...क्यों नहीं लड़ा वो लुटेरों से...रात भर थाने में पूछताछ...एक मिनट भी सोने नहीं देते वो....सुबह छूटता है तो जाता है अपने दफ्तर...वहां से भी थैंक्यू कह दिया गया...अब घर का ही सहारा है...बस खड़ी है...वो बैठ जाता है....घर पहुंचता है लुटी पिटी हालत में....बेटे को तो कभी ऐसा नहीं देखा...मां दौड़ी आती है...बेटा, क्या हुआ ? को कीहिस तोहार ई हाल ? उसकी ज़ुबान तालू से लग चुकी है...जीभ चल नहीं रही...इतना ही मुंह से निकलता है....अम्मा, वहू लै गा....

1 comment:

  1. श्रमजीवी पत्रकारों के सामने जो मौजूदा समस्या है वो इस कहानी से बेहद मार्मिक ढंग से सामने आती है...किसी भी रचना के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होता है कि वो किसी भी देश काल में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखे... मुझे इस कहानी को पढ़ने के बाद लगता है कि विश्वजीत की ये लघुकथा दीर्घकाल तक जीती रहेगी... शुभकामनाएं... पंकज कौरव

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