March 10, 2009
कहानी घर-घर के बाँकों की
इस शीर्षक के लिए एकता कपूर से क्षमायाचना...कॉपीराइट का मामला है भाई, लेकिन क्या करें, मीडिया में मेरे जैसे लोग उठाईगीर ही होते हैं...सो इस कहानी के लिए यह शीर्षक सधन्यवाद उनके सौजन्य से लेते हैं और शुरू करते हैं कहानी घर-घर के बाँकों की... विक्रम ने वेताल को पीठ पर फिर लादा और श्मशान की ओर चल दिया...रास्ता लंबा था...पीठ पर टंगे वेताल ने फिर एक कहानी विक्रम को सुनानी शुरू कर दी...वेताल बोला...सुनो विक्रम, दो बाँकों की इस नई कहानी को...इससे तुम्हें थकान नहीं होगी और मुझे आसानी से श्मशान तक पहुंचा सकोगे...वेताल की कहानी इस प्रकार थी - दो बाँके थे...एक ही घर में...दोनों लड़ते रहते थे...सुबह से रात तक बाँकों की जंग होती रहती थी...इन बाँकों के साथ कुछ छोटे बाँके भी थे...ये छोटे बाँके भी इस जंग में अपने-अपने हिसाब से मौजूदगी दर्ज कराते रहते थे...झगड़ा छोटी-छोटी बातों पर होता था...लेकिन इन छोटी बातों पर होने वाली जंग कई बार लंबी खिंचती थी...दोनों बाँके इस जंग को जीतने पर आमादा रहते...कैसे एक-दूसरे को पटकनी दी जाए, इस पर हमेशा चिंतन मनन चलता रहता था...रात में नींद में भी दिमाग में चालें आती रहती थीं...घर के बड़े बुजुर्ग परेशान...कैसे थमे यह घमासान...बड़े जतन किए...जंग जब शुरू हुई तो समझाया...कभी डांटा, लेकिन एक बाँका अपनी जांघों पर थाप दे तो भला दूसरा कैसे चुप रहे...सारे बाँके अपना नंबर बनाने और दूसरे का पीछे से बिगाड़ने का काम करते...झगड़ा था उस ज़मीन के लिए, जिसकी पैदावार से बाँकों के परिवार पेट भरते थे...परिवार बड़ा था...इसलिए ज़मीन से कम से कम इतनी पैदावार होनी ज़रूरी थी कि खर्चा चलता रहे और कर्ज़ न बढ़े...लेकिन बाँकों को कौन समझाए...हर बार कम पैदावार का ज़िम्मेदार एक-दूसरे को वो ठहराते...एक बीज बोता, तो दूसरा उन्हें निकाल फेंकने का पूरा जतन करता...एक की फसल थोड़ी उगती तो दूसरा सोचता कि कैसे इसे काट लिया जाए...काटने और फेंकने की यह जंग जारी रही...जंग चल रही है...पता नहीं कभी खत्म होगी भी या नहीं...सब यही कहते हैं कि खेत (यानी बचा खुचा) सकुशल है... कहानी सुनाने के बाद वेताल ने फिर विक्रम के सामने एक सवाल दाग दिया...पूछा कौन हैं ये बाँके और किस घर की कहानी है ये...जानते हुए भी नहीं बताओगे तो तुम्हारे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे...विक्रम रुका...धोती के फेंटे से एक पुड़िया निकाली...कहा, तुम्हारी कहानी से वैसे ही सिर फटा जा रहा है...ज़रा डिस्प्रिन खा लूं...वैसे मेरा भी एक सवाल है...सवाल ये कि बाँकों वाले उस घर में डिस्प्रिन की खपत कितनी थी ? आप भी बूझिए...कौन से घर की कहानी है ये और दोनों बाँके कौन हैं...
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