पिछले दिनों मैंने एक ब्लॉग पोस्ट किया था, जिसका शीर्षक गर्त में पत्रकारिता था...मैंने उसमें रिपोर्टर्स के स्टोरी देने के तौर तरीकों पर सवाल उठाए थे....मेरे कई साथी इससे आहत हुए...एक से मैंने बाकायदा माफी भी मांगी...आज ये पोस्ट इसलिए लिख रहा हूं कि पत्रकारिता को गर्त में धकेलने वाले अकेले रिपोर्टर नहीं हैं...इंस्टीट्यूट्स से ताज़ा ताज़ा निकले और डेस्क पर आने वाले भी आधी अधूरी जानकारी के साथ आते हैं...पहली वजह यही है कि वे पढ़ते लिखते नहीं...टीवी पत्रकारिता का कोर्स वे करते हैं, लेकिन टीवी क्या है, इसकी खबरें कैसे चलती हैं, ये ज़्यादातर जगह उन्हें बताया नहीं जाता...स्क्रिप्ट कैसी होनी चाहिए, कैसे इसे catchy बनाया जाए, ये उन्हें पता नहीं होता...आज ये ब्लॉग मैं ऐसे ही साथियों के लिए लिख रहा हूं...उम्मीद है मेरा लिखा उनके काम आएगा...
1. पहली बात तो ये कि जो भी खबर बनाएं, उसके लिए पहले visuals देखें....visuals के मुताबिक ही टीवी की स्क्रिप्ट लिखी जाती है....आपने पहले अति उत्साह में स्क्रिप्ट लिख ली और उसके मुताबिक visual नहीं मिले तो आपका अच्छा लिखा हुआ भी बेकार हो जाएगा...टीवी चूंकि दृश्य माध्यम है, इस वजह से visuals के साथ जितना खेलेंगे, उतना ही दर्शकों को अपनी खबर से आप जोड़ सकेंगे...लेकिन ध्यान रखना चाहिए कि आपकी स्क्रिप्ट में नाटकीयता न हो...ज़्यादा नाटकीयता दर्शक पकड़ लेता है और आपकी खबर उसे हल्की लगने लगती है...
2. टीवी पर खबर को एंकर विजुअल, जिसे कहीं कहीं एसटीडी वीओ कहा जाता है, एंकर बाइट और पैकेज के तौर पर चलाया जाता है...डेस्क में खबर आते ही पहले उसे एंकर विजुअल या एंकर बाइट के तौर पर एयर किया जाता है और बाद में ज़रूरी हुआ तो इसे पैकेज में कन्वर्ट किया जाता है...पैकेज में वॉयस ओवर और बाइट होते हैं...मैंने कई साथियों को देखा कि वो बिना एंकर लिंक लिखे ही वीओ और बाइट के ज़रिए पैकेज लिख देते हैं...लेकिन मुझे लगता है कि किसी भी पैकेज में एंकर से पहला वीओ, उस वीओ से पहली बाइट फिर बाइट से दूसरा वीओ, फिर दूसरी बाइट और फिर फाइनल वीओ जुड़े होते हैं...अगर आपका एंकर catchy है तो आप की ख़बर देखने के लिए दर्शक मजबूर होगा, वरना पैकेज चाहे कितना ही अच्छा हो, दर्शक अपने रिमोट के ज़रिए दूसरे चैनल पर भी जा सकता है...
3. अब बात editing की...एडिटिंग में जम्प का ध्यान रखने पर और visuals का तारतम्य होने पर ही कोई स्टोरी अच्छी बनती है...अमूमन जम्प में टाइम जम्प, लोकेशन जम्प, कलर जम्प का खास ध्यान रखना पड़ता है...अगर आपने पहले दिन का फुटेज लगाया, फिर रात या शाम का और फिर दिन का फुटेज लगाया तो ये टाइम जम्प होता है...लोकेशन जम्प में अगर आप किसी शख्स को पहले कहीं और, फिर कहीं और, उसके बाद पहली वाली लोकेशन पर दिखाते हैं तो आपकी स्टोरी ख़राब हो जाती है...कलर जम्प भी ऐसा ही होता है...अगर आप नीला रंग दिखा रहे हैं, फिर आप बैंगनी और फिर नीले पर आ जाएं तो ये कलर जम्प होता है...एक और जम्प एक्सिस जम्प कहलाता है...एक्सिस जम्प में किसी व्यक्ति या जगह को पहले बाएं से दिखाएं, फिर दूसरे शॉट में उसके दाएं आ जाएं तो ये एक्सिस जम्प कहलाएगा...होना ये चाहिए कि कैमरा घूमे...यानी पहले बाएं, फिर सामने और फिर दाएं आए...
4. कई जगह अंग्रेज़ी में बाइट होती है तो उसका पैरा डब करने का चलन है, लेकिन मुझे लगता है कि इससे जो बाइट है उसकी आत्मा मर जाती है...ठीक वैसे ही, जैसे किसी दूसरी भाषा की फिल्म को डब करने पर होता है...पैरा डब की जगह अगर उस व्यक्ति की बोली जा रही बातों का ट्रांसलेशन दिया जाए तो ये अच्छा लगता है...
पहली किस्त में इतना ही...
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It is nice to see that the writer is simply not critisizing but showing the way for his colleagues. I'd call it a good gesture.....
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